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गन्ने में कंडुवा (स्मट) रोग से 30% तक उपज घटती है: 2026-27 में काली चाबुक पहचानें, 7 स्टेप में रोकथाम का पूरा गाइड

Aamir Raza Aamir Raza • Nov 6, 2026 • 12 min read
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गन्ने में कंडुवा (स्मट) रोग से 30% तक उपज घटती है: 2026-27 में काली चाबुक पहचानें, 7 स्टेप में रोकथाम का पूरा गाइड
अंतिम अपडेट: November 6, 2026 9:03 AM IST — यह आर्टिकल नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

खेत में खड़े गन्ने के ऊपर अगर काली, चाबुक जैसी लंबी चीज़ निकल आई है, तो उसे हल्के में मत लीजिए। यह कंडुवा रोग है — गन्ने की सबसे खतरनाक फफूंद जनित बीमारियों में से एक। जिस पौधे पर यह काली चाबुक बनती है, उसमें गन्ना बनता ही नहीं, और उस एक पौधे से निकले काले बीजाणु हवा के साथ पूरे खेत में फैलकर अगले साल की फसल को भी बीमार कर देते हैं। पेराई सीजन 2026-27 में जब खड़ी फसल पक रही है, यही वह समय है जब कंडुवा सबसे साफ दिखता है — और यही वह समय है जब एक छोटी-सी लापरवाही पूरे खेत का नुकसान बन जाती है।

इस गाइड में आप जानेंगे कि कंडुवा (स्मट) रोग क्या है, इसे खेत में कैसे पहचानें, यह कितना नुकसान करता है, और इसे रोकने के 7 पक्के कदम कौन से हैं। साथ में बीज उपचार, रोगग्रस्त पौधे उखाड़ने का सही तरीका, पेड़ी का फैसला और वे गलतियां भी बताई गई हैं जो किसान आमतौर पर कर बैठते हैं।

कंडुवा (स्मट) रोग क्या है

कंडुवा रोग एक फफूंद (स्पोरिसोरियम सिटामिनी) से होता है। यह बीज जनित और मृदा जनित दोनों तरह से फैलता है, यानी रोग बीज के गन्ने के टुकड़ों (सेट्स) के अंदर भी छिपा रह सकता है और खेत की मिट्टी में भी। गर्म और शुष्क मौसम में यह रोग तेजी से बढ़ता है, इसलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में यह अक्सर देखने को मिलता है।

इस रोग की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पौधे के अंदर चुपचाप बढ़ता है। बुवाई के समय बीज में छिपा फफूंद पौधे के साथ-साथ बढ़ता है और जब गन्ना बढ़ने लगता है, तब ऊपर से काली चाबुक निकल आती है। इसलिए बुवाई के समय जो गन्ना बिल्कुल स्वस्थ दिखता है, वह भी 5-6 महीने बाद रोगग्रस्त निकल सकता है। यही वजह है कि कंडुवा को सिर्फ दवा छिड़ककर खत्म नहीं किया जा सकता — इसकी रोकथाम बीज से ही शुरू होती है।

कंडुवा रोग की पहचान: 5 साफ लक्षण

कंडुवा की पहचान बाकी रोगों से आसान है, क्योंकि इसका मुख्य लक्षण खेत में दूर से दिख जाता है।

1. काली चाबुक (व्हिप): रोगग्रस्त पौधे के ऊपर से काली, चाबुक जैसी लंबी संरचना निकलती है। यह 25 से 150 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती है। पहले यह पतली सफेद झिल्ली से ढकी रहती है, फिर झिल्ली फटकर काला पाउडर जैसा बीजाणु बाहर आ जाता है। यही इस रोग की सबसे पक्की पहचान है।

2. घास जैसी झाड़ी (ग्रासी शूट): रोगग्रस्त गन्ने के ठूंठ से बहुत सारे पतले-पतले कल्ले निकल आते हैं, जो घास के गुच्छे जैसे दिखते हैं। इनमें गन्ना नहीं बनता, सिर्फ पतली पत्तियां होती हैं।

3. पतले और कमजोर गन्ने: रोग वाले पौधे के गन्ने पतले, छोटे और कमजोर रहते हैं। गांठों के बीच की दूरी बढ़ जाती है और गन्ने का वजन नहीं बनता।

4. संकरी पत्तियां: रोगग्रस्त पौधे की पत्तियां सामान्य से संकरी और हल्के रंग की दिखती हैं। पौधा बौना रह जाता है।

5. गन्ना न बनना: जिस कल्ले पर चाबुक बन गई, उसमें गन्ना बिल्कुल नहीं बनता। वह कल्ला सिर्फ बीजाणु फैलाने का काम करता है।

अगर खेत में 10 में से 1 पौधे पर भी चाबुक दिखे, तो समझिए रोग खेत में आ चुका है और तुरंत कार्रवाई जरूरी है।

कंडुवा से कितना नुकसान होता है

कंडुवा का नुकसान सिर्फ उपज में नहीं, चीनी की मात्रा में भी होता है। नीचे दी गई तालिका से समझिए कि रोग का प्रकोप बढ़ने पर नुकसान कैसे बढ़ता है।

खेत में रोग का प्रकोपउपज पर असरचीनी पर असर
5% तक पौधे रोगग्रस्त5-10% तक उपज घटती हैहल्का असर
10-20% पौधे रोगग्रस्त15-25% तक उपज घटती हैचीनी प्रतिशत घटने लगता है
30% से ज्यादा पौधे रोगग्रस्त30-40% तक उपज घट सकती हैचीनी रिकवरी साफ घटती है
पूरी तरह रोगग्रस्त खेतगन्ना लगभग नहीं बनतामिल को भेजने लायक फसल नहीं

एक और नुकसान यह है कि रोगग्रस्त खेत का गन्ना बीज के काम का नहीं रहता। अगर ऐसे गन्ने को अगले साल बीज के रूप में बो दिया जाए, तो नई फसल में भी रोग आ जाएगा। यानी एक साल की गलती दो साल का नुकसान बन जाती है। पेड़ी फसल में यह रोग और बढ़ जाता है, क्योंकि फफूंद ठूंठ में ही रह जाता है।

कंडुवा रोग कैसे फैलता है

रोग को रोकने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि यह फैलता कैसे है।

रोगग्रस्त बीज से: यह फैलाव का सबसे बड़ा रास्ता है। जिस खेत में कंडुवा था, उसी के गन्ने को बीज बनाकर बोने से नई फसल में रोग आ जाता है। फफूंद बीज के अंदर छिपा रहता है, इसलिए बाहर से बीज स्वस्थ दिखता है।

हवा से: चाबुक पर बना काला पाउडर हवा के साथ उड़कर दूर तक जाता है। यह पड़ोसी खेतों में भी रोग पहुंचा सकता है। इसलिए एक खेत में चाबुक खड़ी रह जाए तो आसपास के खेत भी खतरे में आ जाते हैं।

पेड़ी से: कटाई के बाद ठूंठ में बचा फफूंद पेड़ी फसल में फिर से उग आता है। रोगग्रस्त खेत की पेड़ी में कंडुवा का प्रकोप पौध फसल से ज्यादा होता है।

खेत के औजारों से: रोगग्रस्त खेत में काम करने वाले औजार, ट्रॉली या मजदूरों के कपड़ों से भी बीजाणु दूसरे खेत तक पहुंच सकते हैं, हालांकि यह फैलाव बीज और हवा की तुलना में कम होता है।

7 स्टेप में कंडुवा रोग की रोकथाम का पूरा प्लान

कंडुवा का कोई एक छिड़काव वाला इलाज नहीं है। इसे रोकने के लिए नीचे दिए गए 7 कदम एक साथ अपनाने होते हैं।

स्टेप 1: स्वस्थ और प्रमाणित बीज ही बोएं

सबसे पहला और सबसे असरदार कदम है बीज का सही चुनाव। बीज हमेशा ऐसे खेत से लें, जिसमें कंडुवा का एक भी पौधा न दिखा हो। गन्ना शोध संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र या विश्वसनीय नर्सरी से प्रमाणित बीज लेना सबसे सुरक्षित रहता है। अपने ही खेत के गन्ने को बीज बनाते समय यह जरूर देखें कि उस खेत में पिछले सीजन में चाबुक तो नहीं दिखी थी। अगर खेत में रोग था, तो उसका गन्ना बीज के लिए बिल्कुल इस्तेमाल न करें।

स्टेप 2: बुवाई से पहले बीज उपचार करें

बीज के सेट्स को बोने से पहले फफूंदनाशी से उपचार करना कंडुवा की रोकथाम का दूसरा पक्का कदम है। आमतौर पर कार्बेन्डाजिम जैसे फफूंदनाशी से बीज उपचार की सलाह दी जाती है। मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ/कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें। इसके अलावा गर्म पानी से बीज उपचार (मोइस्ट हॉट एयर ट्रीटमेंट) भी सेट्स में छिपे फफूंद को मारने में मदद करता है — इसका तापमान और समय अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से पूछकर ही तय करें। बीज उपचार सिर्फ कंडुवा ही नहीं, रेड रॉट जैसे दूसरे बीज जनित रोगों से भी बचाता है।

स्टेप 3: रोगग्रस्त पौधे दिखते ही उखाड़ें (रोगिंग)

खेत में जैसे ही काली चाबुक दिखे, उस पौधे को तुरंत उखाड़ दें। इसे रोगिंग कहते हैं और यही वह कदम है जो रोग को पूरे खेत में फैलने से रोकता है। सही तरीका यह है:

  • चाबुक वाले पौधे को पहले पॉलिथीन की थैली से ढक लें, ताकि उखाड़ते समय काला पाउडर हवा में न उड़े।
  • पौधे को जड़ समेत उखाड़ें, सिर्फ ऊपर से काटकर न छोड़ें।
  • उखाड़े हुए पौधे को खेत से दूर ले जाकर गड्ढे में दबाएं या जलाएं। इसे खेत की मेड़ पर या नाली में न फेंकें।
  • यह काम सुबह के समय करें, जब हवा कम चलती हो, ताकि बीजाणु कम फैलें।
  • रोगिंग का काम बुवाई के 3-4 महीने बाद से शुरू करके कटाई तक हर 15-20 दिन में दोहराएं।

एक चाबुक को खेत में खड़ा छोड़ देना दर्जनों नए पौधों को बीमार करने के बराबर है, इसलिए इसमें देर न करें।

स्टेप 4: प्रतिरोधी किस्म चुनें

किस्म का चुनाव भी कंडुवा से बचाव में बड़ा फर्क डालता है। पुरानी किस्म को 1148 कंडुवा के प्रति अतिसंवेदनशील मानी जाती है, जबकि को 0238 जैसी नई किस्मों में इस रोग का प्रकोप तुलनात्मक रूप से कम रहता है। किस्म चुनते समय अपने क्षेत्र के गन्ना शोध संस्थान या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें कि आपके जिले की मिट्टी और मौसम के लिए कौन-सी प्रतिरोधी किस्म सबसे अच्छी रहेगी। सिर्फ उपज देखकर किस्म न चुनें — रोग प्रतिरोधकता भी उतनी ही जरूरी है।

स्टेप 5: फसल चक्र अपनाएं

लगातार एक ही खेत में गन्ना बोने से मिट्टी में फफूंद बढ़ता जाता है। जिस खेत में कंडुवा का प्रकोप ज्यादा रहा हो, वहां अगले सीजन में गन्ने की बजाय गेहूं, सरसों, चना या मटर जैसी दलहन-तिलहन फसल बोएं। एक सीजन का फसल चक्र मिट्टी में बचे फफूंद को कम कर देता है और अगली गन्ना फसल स्वस्थ रहती है। हरी खाद के लिए ढैंचा बोना भी मिट्टी की सेहत सुधारता है।

स्टेप 6: पेड़ी रखने से पहले रोग का स्तर जांचें

पेड़ी में कंडुवा पौध फसल से ज्यादा बढ़ता है, इसलिए पेड़ी रखने का फैसला रोग का स्तर देखकर करें। अगर पौध फसल में 10% से ज्यादा पौधे रोगग्रस्त रहे हों, तो उस खेत की पेड़ी न रखें — नई बुवाई करें। 5% से कम रोग हो तो पेड़ी रखी जा सकती है, लेकिन रोगिंग का काम पेड़ी में और भी सख्ती से करना होगा। कटाई के बाद ठूंठ की सफाई और स्टबल शेवर से फुटाव भी पेड़ी में रोग कम करने में मदद करता है।

स्टेप 7: खेत की सफाई और निगरानी जारी रखें

कटाई के बाद खेत में पड़े रोगग्रस्त अवशेषों को जलाएं या गड्ढे में दबाएं, उन्हें खेत में सड़ने न छोड़ें। बुवाई के बाद पहले 100 दिनों में खेत की नियमित निगरानी करें — इसी दौरान चाबुक बननी शुरू होती है। पड़ोसी खेत में रोग दिखे तो अपने खेत की जांच और भी ध्यान से करें, क्योंकि हवा से बीजाणु आपके खेत तक भी आ सकते हैं।

कंडुवा और रेड रॉट में फर्क कैसे पहचानें

कई किसान कंडुवा को रेड रॉट से भ्रमित कर लेते हैं, लेकिन दोनों अलग रोग हैं और इनकी पहचान भी अलग है।

बातकंडुवा (स्मट)रेड रॉट
मुख्य लक्षणऊपर से काली चाबुक निकलती हैगन्ना अंदर से लाल होकर सड़ता है, बदबू आती है
पौधा कैसा दिखता हैपतले कल्लों का घास जैसा गुच्छागन्ना सूखकर मुरझाता है
फैलावबीज, हवा और पेड़ी सेबीज और बरसात के पानी से
रोकथाम की कुंजीस्वस्थ बीज + रोगिंगबीज उपचार + जल निकासी

दोनों रोगों में बीज उपचार काम आता है, इसलिए बुवाई से पहले बीज का उपचार दोनों से बचाव का साझा कदम है।

कंडुवा से जुड़ी 5 आम गलतियां जिनसे बचें

1. चाबुक वाले पौधे को खेत में छोड़ देना: सबसे बड़ी गलती। एक चाबुक लाखों बीजाणु बनाती है। इसे देखते ही उखाड़ें।

2. रोगग्रस्त खेत का गन्ना बीज बनाना: कंडुवा वाले खेत का गन्ना सस्ता बीज लगता है, लेकिन इससे अगली फसल भी बीमार हो जाती है। बीज हमेशा स्वस्थ खेत से लें।

3. सिर्फ दवा छिड़ककर रोग खत्म होने की उम्मीद: कंडुवा पौधे के अंदर बढ़ता है। पत्तियों पर छिड़काव से यह खत्म नहीं होता। बीज उपचार और रोगिंग ही असली उपाय हैं।

4. रोगग्रस्त खेत की पेड़ी रख लेना: 10% से ज्यादा रोग वाले खेत की पेड़ी में रोग और बढ़ता है। ऐसी पेड़ी से बचें।

5. उखाड़े पौधे को मेड़ पर फेंक देना: उखाड़ा हुआ पौधा भी बीजाणु फैलाता रहता है। उसे गड्ढे में दबाएं या जलाएं।

पेराई सीजन 2026-27 में कंडुवा वाले गन्ने का क्या करें

अगर आपकी खड़ी फसल में कंडुवा दिखा है, तो कटाई के समय कुछ बातों का ध्यान रखें। रोगग्रस्त गन्ने को स्वस्थ गन्ने से अलग करके मिल को भेजें और उसे बीज के लिए बिल्कुल अलग न रखें। कटाई के बाद खेत की सफाई करके ही पेड़ी का फैसला करें। मिल को गन्ना भेजते समय ताजा कटाई का ध्यान रखें, क्योंकि कंडुवा वाले गन्ने में वैसे भी चीनी कम होती है और देर से भेजने पर वजन और चीनी दोनों और घटते हैं। भुगतान ट्रैक करने के लिए पर्ची और कैलेंडर का रिकॉर्ड रखें, ताकि रोग से हुआ नुकसान और भुगतान का हिसाब साफ रहे।

पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: गन्ने में काली चाबुक दिखे तो क्या यह कंडुवा ही है? हां, गन्ने के ऊपर से निकली काली, चाबुक जैसी लंबी संरचना कंडुवा (स्मट) रोग की सबसे पक्की पहचान है। इसे देखते ही पौधे को पॉलिथीन से ढककर जड़ समेत उखाड़ें और गड्ढे में दबाएं या जलाएं।

प्रश्न 2: क्या कंडुवा का कोई छिड़काव वाला इलाज है? नहीं, कंडुवा पौधे के अंदर बढ़ता है, इसलिए पत्तियों पर छिड़काव से यह खत्म नहीं होता। इसकी रोकथाम स्वस्थ बीज, बीज उपचार, रोगिंग और प्रतिरोधी किस्म से ही होती है। दवा का इस्तेमाल सिर्फ बीज उपचार में होता है। मात्रा के लिए कृषि विशेषज्ञ/कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें।

प्रश्न 3: कंडुवा वाले खेत की पेड़ी रखनी चाहिए या नहीं? अगर पौध फसल में 10% से ज्यादा पौधे रोगग्रस्त थे, तो पेड़ी न रखें। 5% से कम रोग हो तो पेड़ी रख सकते हैं, लेकिन रोगिंग सख्ती से करें। पेड़ी में रोग पौध फसल से ज्यादा बढ़ता है।

प्रश्न 4: कंडुवा से कितनी उपज घटती है? हल्के प्रकोप (5% तक) में 5-10% उपज घटती है, जबकि 30% से ज्यादा प्रकोप में उपज 30-40% तक घट सकती है। साथ में चीनी प्रतिशत भी घटता है, इसलिए नुकसान दोगुना होता है।

प्रश्न 5: कंडुवा का बीजाणु कितनी दूर तक फैल सकता है? चाबुक का काला पाउडर हवा के साथ उड़कर पड़ोसी खेतों तक पहुंच जाता है। इसलिए एक खेत में रोग दिखे तो आसपास के खेतों की जांच भी जरूरी है।

प्रश्न 6: बीज उपचार से कंडुवा पूरी तरह रुक जाता है? बीज उपचार से बीज के अंदर छिपा फफूंद काफी हद तक खत्म हो जाता है, लेकिन हवा से आने वाले बीजाणु से बचाव के लिए रोगिंग और स्वस्थ किस्म भी जरूरी है। कोई एक उपाय अकेला काफी नहीं है।

प्रश्न 7: कंडुवा रोग किस मौसम में ज्यादा फैलता है? गर्म और शुष्क मौसम में यह रोग तेजी से बढ़ता है। बुवाई के बाद 3-6 महीने के बीच चाबुक सबसे ज्यादा दिखती है, इसलिए इसी दौरान खेत की निगरानी सबसे जरूरी है।

आखिरी बात

कंडुवा रोग का सबसे बड़ा सबक यह है कि गन्ने की सेहत बुवाई से ही तय हो जाती है। स्वस्थ बीज, सही बीज उपचार और समय पर रोगिंग — ये तीन काम अगर हर सीजन में किए जाएं, तो कंडुवा का नुकसान लगभग खत्म हो जाता है। पेराई सीजन 2026-27 में खेत में चाबुक दिखे तो उसे नजरअंदाज न करें — आज उखाड़ा गया एक पौधा अगले साल के पूरे खेत को बचा सकता है। अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़े रहें, क्योंकि रोग की सही पहचान और बीज उपचार की मात्रा के लिए स्थानीय सलाह ही सबसे भरोसेमंद होती है।

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Aamir Raza
लेखक एवं मुख्य संपादक

Aamir Raza

संस्थापक एवं प्रधान संपादक — CaneUp.xyz। उत्तर प्रदेश गन्ना उद्योग, पर्ची कैलेंडर, SAP/MSP मूल्य नीति, ई-गन्ना पोर्टल और किसान अधिकारों पर 10+ वर्षों का जमीनी अनुभव।

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