30 साल से बकाया ₹14.73 करोड़, 750 मजदूर आज भी इंतजार में — देवरिया की गौरीबाजार चीनी मिल की पूरी कहानी

देवरिया के गौरीबाजार में एक बंद चीनी मिल के गेट पर हर रविवार एक ही दृश्य दोहराता है — मजदूर इकट्ठा होते हैं, मांग दोहराते हैं और घर लौट जाते हैं। यह सिलसिला 12 साल से चल रहा है। मिल बंद हुए 30 साल हो गए, लेकिन 750 मजदूरों की मेहनत का पैसा आज तक नहीं मिला। किसानों का करीब ₹1.62 करोड़ भी उसी फाइल में अटका है।
26 अक्टूबर 2026 को समाजवादी मजदूर सभा ने देवरिया कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर डीएम के माध्यम से राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा। पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा ने भुगतान न होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है।
₹14.73 करोड़ का हिसाब क्या है
मांगपत्र के अनुसार, गौरीबाजार चीनी मिल पर 750 मजदूरों के कुल ₹14,73,03,876.22 बकाया हैं, जबकि किसानों का करीब ₹1.62 करोड़ भुगतान लंबित है। एक रिपोर्ट के अनुसार इस बकाये से करीब 3,500 किसान भी प्रभावित हैं।
यह आंकड़ा नया नहीं है — मई 2026 की एक रिपोर्ट में भी यही रकम दर्ज थी। यानी छह महीने में बकाया एक रुपया भी कम नहीं हुआ।
मिल बंद कैसे हुई — 1995-96 से अब तक की कहानी
गौरीबाजार शुगर फैक्ट्री भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय की मिल थी। वर्ष 1995-96 में इसे बंद कर दिया गया। मजदूरों का कहना है कि बंद करते समय न कोई नोटिस दिया गया, न ले-ऑफ हुआ और न पे-ऑफ मिला। नियमानुसार वे आज भी कार्यरत माने जाते हैं, क्योंकि उनकी सेवा औपचारिक रूप से समाप्त ही नहीं की गई।
बाद में इसे गंगोत्री एंटरप्राइजेज को बेचा गया। सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों के पक्ष में फैसला दिया तो मिल वापस हुई, लेकिन फिर राजेंद्र इस्पात कोलकाता ने यूनियन से मिलकर पूरी मशीनरी उखाड़ ली और मजदूर आवास गिरवा दिए। आज परिसर में खंडहर हैं और 60.78 एकड़ जमीन पर कब्जे की बात सामने आती रही है। मिल की क्षमता 1,000 टीसीडी थी।
मजदूर नेता ऋषिकेश यादव के अनुसार, मजदूर 12 साल से हर रविवार फैक्ट्री गेट पर विरोध करते आ रहे हैं। कई मजदूर आज मनरेगा या दिल्ली-मुंबई में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं।
वसूली प्रमाण-पत्र दो बार वापस — सबसे बड़ा आरोप
इस पूरे मामले में मजदूरों का सबसे बड़ा आरोप वसूली प्रमाण-पत्रों को लेकर है। ज्ञापन में कोर्ट के आदेश और श्रम विभाग की ओर से जारी वसूली प्रमाण-पत्रों का हवाला दिया गया है। संगठन का कहना है कि मजदूरों के पक्ष में जारी इन प्रमाण-पत्रों को प्रशासनिक स्तर पर दो बार वापस कर दिया गया, जिससे बकाया भुगतान की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
मांग है कि प्रमाण-पत्रों को दोबारा प्रभावी कर बकाया दिलाया जाए। पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा के अनुसार, यह संघर्ष वर्ष 2015-16 से चल रहा है — अब एक दशक पुरानी लड़ाई।
26 अक्टूबर का प्रदर्शन — अब क्या मांगा जा रहा है
26 अक्टूबर को समाजवादी मजदूर सभा के जिलाध्यक्ष ऋषिकेश यादव के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और कलेक्ट्रेट पहुंचकर राज्यपाल के नाम संबोधित ज्ञापन डीएम को सौंपा। ज्ञापन में बकाया भुगतान, वसूली प्रमाण-पत्रों को दोबारा प्रभावी करने, मिल की जमीन-मशीनरी की जांच और मिल परिसर में नया उद्योग स्थापित कर स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की मांग की गई है।
पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा ने समय रहते भुगतान न होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।
सिर्फ गौरीबाजार नहीं — देवरिया की चारों बंद मिलें
गौरीबाजार की कहानी देवरिया में अकेली नहीं है। जिले की चार बड़ी चीनी मिलें — देवरिया, बैतालपुर, गौरीबाजार और भटनी — बंद हो चुकी हैं। इन मिलों में करोड़ों की मशीनें कबाड़ हो चुकी हैं और करीब 20,000 परिवारों की जिंदगी पटरी से उतर गई है। इन बंद मिलों से करीब 8,000 स्थायी और 12,000 मौसमी मजदूरों की रोजी-रोटी जुड़ी थी।
देवरिया मिल 2011 में आइकॉन शुगर दिल्ली को बेची गई थी। गन्ना संस्थान के पूर्व उपाध्यक्ष नीरज शाही के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में मामला होने से दिक्कत है और उन्होंने सीएम से नई मिल की मांग की है।
देवरिया में ही — प्रतापपुर में ₹650 प्रति क्विंटल की मांग
गौरीबाजार से कुछ ही दूरी पर देवरिया के ही रामपुर बुजुर्ग में 29 अक्टूबर को अखिल भारतीय किसान सभा के कार्यकर्ताओं ने सहकारी गन्ना समिति, प्रतापपुर के कार्यालय पर धरना दिया। उनकी मांग है कि पेराई सत्र 2026-27 के लिए गन्ने का मूल्य ₹650 प्रति क्विंटल घोषित किया जाए और प्रतापपुर चीनी मिल का संचालन शुरू होने से पहले पिछले पेराई सत्र के सभी बकाये का ब्याज सहित भुगतान कराया जाए।
किसानों ने पहले चरण में पेड़ी गन्ने की आपूर्ति और 14 दिनों के भीतर भुगतान की भी मांग की है, और कार्रवाई न होने पर मिल गेट पर अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी दी है।
यहां यह साफ करना जरूरी है कि 2026-27 पेराई सत्र के लिए यूपी के गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) की घोषणा अभी बाकी है। 2025-26 के लिए एसएपी अगैती किस्म पर ₹400 प्रति क्विंटल और सामान्य किस्म पर ₹390 प्रति क्विंटल था। ₹650 की मांग किसान संगठनों की मांग है, फैसला नहीं।
बकाया भुगतान के लिए किसान-मजदूर क्या कर सकते हैं
पहला, बकाया लिखित में दर्ज कराइए — गन्ना समिति या जिला गन्ना अधिकारी को शिकायत देकर पावती संभालकर रखें। मजदूर श्रम विभाग से संपर्क करें और कोर्ट के आदेश या वसूली प्रमाण-पत्र की प्रति अपने पास रखें।
दूसरा, चालू मिलों के किसानों के लिए भुगतान की स्थिति ई-गन्ना ऐप या caneup.in पर देखी जा सकती है। किसी भी तरह की शिकायत के लिए गन्ना विभाग के टोल-फ्री नंबर 1800-121-3203 और 1800-180-5129 तथा एसएमएस शॉर्टकोड 51969 उपलब्ध हैं।
गौरीबाजार की कहानी बताती है कि बकाया सिर्फ पैसों का मामला नहीं होता — मिल बंद होने पर एक पूरे कस्बे की रोजी-रोटी और भरोसा भी बंद हो जाता है। 30 साल का इंतजार एक ज्ञापन से खत्म नहीं होगा, लेकिन हर प्रदर्शन इस फाइल को फिर मेज पर ले आता है।
पूछे जाने वाले प्रश्न
गौरीबाजार चीनी मिल कब बंद हुई थी? वर्ष 1995-96 में। यह भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय की मिल थी; बंद करते समय न नोटिस, न ले-ऑफ और न पे-ऑफ मिला।
मजदूरों और किसानों का कितना बकाया है? मांगपत्र के अनुसार 750 मजदूरों के ₹14,73,03,876.22 (करीब ₹14.73 करोड़) और किसानों के करीब ₹1.62 करोड़ बकाया हैं। करीब 3,500 किसान इस बकाये से प्रभावित हैं।
वसूली प्रमाण-पत्रों को लेकर क्या आरोप है? आरोप है कि मजदूरों के पक्ष में जारी प्रमाण-पत्र प्रशासनिक स्तर पर दो बार वापस कर दिए गए, जिससे भुगतान रुका। मांग है कि इन्हें दोबारा प्रभावी किया जाए।
26 अक्टूबर 2026 को देवरिया में क्या हुआ? समाजवादी मजदूर सभा ने जिलाध्यक्ष ऋषिकेश यादव के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया और डीएम के माध्यम से राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा। पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा ने भुगतान न होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।
देवरिया में और कौन सी चीनी मिलें बंद हैं? देवरिया, बैतालपुर, गौरीबाजार और भटनी — चारों बंद हैं। करीब 20,000 परिवार प्रभावित हुए, जिनमें 8,000 स्थायी और 12,000 मौसमी मजदूर थे।
2026-27 के लिए यूपी में गन्ने का भाव क्या तय हुआ है? अभी घोषणा बाकी है। 2025-26 के लिए एसएपी अगैती किस्म पर ₹400 प्रति क्विंटल और सामान्य किस्म पर ₹390 प्रति क्विंटल था। ₹650 प्रति क्विंटल किसान संगठनों की मांग है।
स्रोत: ईटीवी भारत, अमर उजाला, डायनामाइट न्यूज़, जयदेश न्यूज़, बिज़नेस स्टैंडर्ड।
अपनी समस्या या सवाल दर्ज करें
गन्ना पर्ची, सट्टा संशोधन, सर्वे, ई-गन्ना ऐप या भुगतान में कोई भी दिक्कत हो, नीचे अपनी जानकारी भरें। हमारी टीम समाधान में आपकी पूरी मदद करेगी।
यह आर्टिकल कैसा लगा?


